खास प्रसंस्करण उद्योग नीति 2023 घोटाला – सिस्टम का दीमक मनोज कुमार सिंह ने कैसे चूसा जनता का खून. पढ़िए विस्तार से
लखनऊ (Bhadas.org)। सरकार में बैठे अफसर किस तरह सिस्टम को खोखला करते हैं, इसका ताज़ा और शर्मनाक नमूना सामने आया है। यूपी Uttar Pradesh के पूर्व मुख्य सचिव (Former Chief Secretary) मनोज कुमार सिंह Manoj Kumar Singh पर 10 करोड़ रुपये की वसूली का नोटिस जारी हुआ है। आरोप है कि एग्रो प्रोसेसिंग नीति–2023 के नाम पर सरकारी धन का खेल खेला गया — वो भी बाकायदा सरकारी मुहर के साथ।
मनोज कुमार सिंह को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ Chief Minister Yogi Adityanath का बेहद करीबी माना जाता है। जब इन्हें मुख्य सचिव के लिए नामित किया गया था उस समय इस भ्रष्ट महाशय को सबसे इमानदार और सर्वोत्तम काबिल अफसर घोषित करके प्रचारित-प्रसारित किया गया था।
मनोज कुमार सिंह ने कृषि उत्पादन आयुक्त (एपीसी) रहते खाद्य एवं प्रसंस्करण नीति-2023 के दिशा-निर्देशों का उल्लंघन कर चार फर्मों को भुगतान करने का निर्णय किया था।
खाद्य प्रसंस्करण विभाग का भी दायित्व संभाल रहे उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने आरोप लगाया है कि मनोज सिन्हा ने गाइड लाइन के नियमों के विपरीत भुगतान किया था। मामले को गंभीरता से लेते हुए मनोज कुमार सिंह से दस करोड़ रुपये वसूलने के निर्देश दिए हैं।
यहाँ पर सवाल यह भी उभरता है कि उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने Manoj Kumar Singh के मुख्य सचिव के पद पर रहते समय यह कार्यवाही क्यों नहीं की। पद जाते ही ऐसा क्या हो गया कि उस अफसर के विरुद्ध दनादन कार्यवाही शुरू हो गई।
लगता है पूरा सिस्टम बीमार हो चुका है।
आईएएस मनोज कुमार सिंह मूल रूप से रोहतास जिले के शिवसागर प्रखंड के मझुई गांव के रहने वाले हैं. वह 1988 बैच के आईएएस अफसर हैं। वे जुलाई 2025 में सेवा निवृत्त हुए थे।
नोटिस में लिखा गया सच
अपर मुख्य सचिव बी.एल. मीणा के हस्ताक्षर वाले इस आदेश में साफ़ कहा गया है कि “यूपीडीएससी (उत्तर प्रदेश डेवलपमेंट सिस्टम्स कॉरपोरेशन लिमिटेड)” ने नीति के क्रियान्वयन में गाइडलाइन को ताक पर रखकर मनमानी की। परिणाम—10 करोड़ रुपये का दुरुपयोग। अब वही पैसा वापस सरकारी खजाने में जमा कराने का हुक्म जारी हुआ है।
मतलब साफ़ है — जनता के टैक्स का पैसा, जो किसानों के लिए था, वो अफ़सरों के “इनोवेटिव दिमाग़” ने अपने तरीके से इनवेस्ट कर दिया। अब जब परतें खुलीं, तो सरकार के भीतर ही हड़कंप मचा है।
अफसरशाही का नेटवर्क – ‘सेवा’ के नाम पर सेल्फ सर्विस
भड़ास ये सवाल पूछना चाहता है — आखिर इस सिस्टम में ऐसी हिम्मत कैसे होती है कि करोड़ों रुपये के फैसले एक अफसर के कमरे में लिए जाते हैं, और महीनों तक किसी को भनक तक नहीं लगती?
सच यही है कि नीतियां जनता के लिए नहीं, नेटवर्क के लिए बनती हैं।
फ़ाइलों पर स्याही सूखती नहीं कि “कमिशन” और “कनेक्शन” वाले दलाल अफसरों की जेबें गर्म कर देते हैं।
यह कोई पहला मामला नहीं है — बस फर्क इतना है कि इस बार नाम पूर्व मुख्य सचिव का है। वरना छोटे अफसरों के तो पूरे करियर इसी किस्म के ‘एडजस्टमेंट’ में निकल जाते हैं।
‘खास प्रसंस्करण नीति’ का खास मतलब
सरकार की “खास प्रसंस्करण उद्योग नीति 2023” किसानों और छोटे उद्यमों के लिए बनाई गई थी, लेकिन असल में ये ‘खास’ योजना अफसरों के ‘खास’ लोगों के लिए बन गई।
सूत्रों के मुताबिक, कई औद्योगिक इकाइयों को बिना वैधानिक अनुमोदन के वित्तीय मंजूरी दे दी गई — यानी नियमों को मोड़ना, कागजों में जुगाड़ करना और धन को दिशा बदलना। यही असली ‘स्किल इंडिया’ है जो फाइलों में पलता है।
नौकरशाही में खलबली
मनोज कुमार सिंह पहले नगर विकास, फिर औद्योगिक विकास, फिर ग्राम्य विकास — हर जगह ‘विकास’ का ठेका लिए घूमे। अब जब वसूली का नोटिस आया है, तो नौकरशाही में घबराहट है। अफसरों के बीच चर्चा है — “अगर ये कार्रवाई सच में आगे बढ़ी, तो आधा सचिवालय लाइन में लग जाएगा।”
नीति का नाम, लेकिन नीयत पर सवाल!
सरकार की फाइलों में ‘विकास’, ज़मीनी हकीकत में ‘विसंगति’
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने बड़े उत्साह के साथ राज्य में खाद्य प्रसंस्करण उद्योग को बढ़ावा देने और फसलों के सटीक आंकड़े जुटाने के लिए “खाद्य प्रसंस्करण उद्योग नीति” की शुरुआत की थी। नीति का मकसद था—किसान की फसल की सही तस्वीर सामने लाना ताकि योजनाएं धरातल पर उतरें।
इसी नीति के क्रियान्वयन के लिए यूपीडास्प (UPDASP) को 10 करोड़ रुपये की राशि जारी की गई थी। योजना के तहत सरकार चाहती थी कि राज्य के लगभग 8 करोड़ खेतों का डेटा तैयार किया जाए। लेकिन हकीकत यह है कि किस खेत में कौन-सी फसल बोई जा रही है, इसका भौतिक सर्वेक्षण करना न केवल कठिन बल्कि लगभग असंभव था।
सैटेलाइट सर्वे का ठेका, दिशा-निर्देश किनारे
यूपीडास्प ने इस असंभव को ‘संभव’ दिखाने के लिए चार निजी कंपनियों को सैटेलाइट सर्वेक्षण का ठेका दे दिया। हर कंपनी को 18 से 20 जिलों की जिम्मेदारी सौंपी गई। कंपनियों ने जिलों का सैटेलाइट सर्वे किया, रिपोर्टें बनाईं और सरकार व कृषि विभाग को सौंप दीं।
लेकिन अंदरखाने की बात यह है कि यह सब कुछ तय दिशा-निर्देशों को ताक पर रखकर किया गया। न गाइडलाइन का पालन हुआ, न प्रक्रिया का। फाइलें आगे बढ़ती रहीं, और पैसा बहता रहा।
मनोज कुमार सिंह की सफाई
पूर्व मुख्य सचिव मनोज कुमार सिंह का कहना है कि “जब यह परियोजना शुरू हुई थी, उस वक्त मैं कृषि उत्पादन आयुक्त था और यूपीडास्प का अध्यक्ष भी। इसलिए नोटिस भेजने का कोई औचित्य नहीं है।”
उन्होंने यह भी कहा कि जिस अवधि को लेकर नोटिस जारी किया गया है, उस दौरान उनके अलावा दो और अधिकारी भी अलग-अलग समय पर यूपीडास्प के अध्यक्ष रहे, इसलिए जिम्मेदारी सिर्फ उन्हीं पर डालना गलत है।
फाइलों का खेल और सिस्टम की सच्चाई
सरकारी फाइलों में सब कुछ साफ-सुथरा दिखता है — नीति, उद्देश्य, लक्ष्य।
लेकिन जब 10 करोड़ रुपये का हिसाब जनता के नाम पर चलता है और रुकता किसी अफसर की फाइल पर, तो सवाल उठना लाजमी है कि क्या नीति किसानों के लिए बनी थी या कुछ चुनिंदा लोगों के “प्रोसेसिंग” के लिए?
सच यही है —
नीतियां बदलती हैं, अफसर नहीं।
और जब अफसर ही नीति बनाते हैं, तो नीति का असली प्रसंस्करण सत्ता के गलियारों में होता है।
आख़िरी बात
यह मामला केवल एक अफसर का नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम के सड़ने की गंध है।
जब तक सत्ता और नौकरशाही के रिश्ते को पारदर्शी नहीं बनाया जाता, तब तक हर नीति एक नया ‘कमाई प्रोजेक्ट’ बनकर जनता की जेब पर डाका डालती रहेगी।
याद रखिए — सिस्टम में चोर नहीं, पूरा सिस्टम ही चोरी पर टिका है।
और ये ‘वसूली’ का नोटिस नहीं, बल्कि जनता की आंख खोलने का नोटिस है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या नोटिस जारी कर देने भर से पैसे की वसूली हो जाएगी?
जनता का पैसा लूटने वाले क्या इतने इमानदार हो गए हैं कि वे पैसा लौटा देंगे?


