हरियाणा जैसे राज्य में जहां प्रशासन के हर कोने में जाति राजनीति हावी है, जूनियर अधिकारी अक्सर ऊपरी जातियों के दबदबे से जूझते हैं।
हरियाणा पुलिस विभाग में हाल की दो घटनाएं – एक वरिष्ठ IPS अधिकारी और एक सहायक उप-निरीक्षक (ASI) का आत्महत्या करना – न केवल व्यक्तिगत त्रासदियों का प्रतीक हैं, बल्कि पूरे प्रशासनिक तंत्र की गहरी दरारों को उजागर करती हैं। 14 अक्टूबर 2025 को रोहतक में ASI संदीप कुमार लठर की आत्महत्या ने पूरे राज्य को हिलाकर रख दिया। यह घटना मात्र एक मौत नहीं, बल्कि भ्रष्टाचार, दबाव और न्याय की कमी की कहानी है। इस लेख में हम इस केस की गहराई में उतरेंगे, सोचने पर मजबूर करेंगे कि क्या हमारा पुलिस सिस्टम वाकई सुरक्षित हाथों में है, या यह एक जाल है जो खुद अपने ही लोगों को निगल रहा है।
क्या था पूरा मामला
यह मामला दो आत्महत्याओं का सिलसिला है, जो एक-दूसरे से जुड़े हुए लगते हैं। पहली घटना 7 अक्टूबर 2025 को चंडीगढ़ में हुई, जब हरियाणा के ADGP (अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक) वाई. पूरन कुमार ने अपनी सर्विस रिवॉल्वर से खुद को गोली मार ली। पूरन कुमार, जो हरियाणा कैडर के 1995 बैच के IPS अधिकारी थे, ने अपनी मौत से पहले एक 9 पेज का सुसाइड नोट छोड़ा। इस नोट में उन्होंने विभागीय भ्रष्टाचार, जातिवाद और ऊपरी दबाव के आरोप लगाए। उनका परिवार पोस्टमॉर्टम के लिए बॉडी सौंपने से इनकार करता रहा, लेकिन 15 अक्टूबर को चंडीगढ़ के PGIMER में पोस्टमॉर्टम के बाद उनका अंतिम संस्कार किया गया। परिवार ने आरोप लगाया कि जांच में देरी हो रही है और SC/ST एक्ट के तहत कार्रवाई की मांग की गई।
इसके ठीक एक हफ्ते बाद, 14 अक्टूबर को रोहतक के साइबर सेल में तैनात 41 वर्षीय ASI संदीप कुमार लठर ने भी अपनी सर्विस रिवॉल्वर से आत्महत्या कर ली। संदीप ने मौत से पहले एक 3 पेज का सुसाइड नोट और एक वीडियो संदेश छोड़ा। वीडियो में उन्होंने स्पष्ट कहा, “मैं लोगों को जगाने के लिए खुद को कुर्बान कर रहा हूं।” नोट में उन्होंने वाई. पूरन कुमार पर गंभीर आरोप लगाए – जैसे कि हरियाणा के गैंगस्टर राव इंदरजीत के साथ 50 करोड़ रुपये का सौदा, जिसमें भूमि घोटाले और मनी लॉन्ड्रिंग शामिल थी। संदीप ने दावा किया कि पूरन कुमार ने उन्हें और अन्य जूनियर अधिकारियों को दबाया, फर्जी केस बनवाए और भ्रष्टाचार में फंसाने की कोशिश की। रोहतक पुलिस ने संदीप के नोट और वीडियो के आधार पर FIR दर्ज की, जिसमें पूरन कुमार की पत्नी, उनके गनमैन और एक MLA को नामित किया गया।
संदीप के परिवार ने बॉडी पोस्टमॉर्टम के लिए नहीं सौंपी, इसे गांव लाधोत ले गए और न्याय की मांग की। हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने संदीप के घर जाकर परिवार को आश्वासन दिया कि SIT (स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम) जांच करेगी और दोषियों पर कार्रवाई होगी। पूर्व CM भूपिंदर सिंह हुड्डा ने भी हाईकोर्ट जज से जांच की मांग की। पुलिस स्रोतों के अनुसार, संदीप पूरन कुमार केस की जांच में शामिल नहीं थे, लेकिन उनके आरोपों ने मामला और जटिल बना दिया। X (पूर्व ट्विटर) पर चर्चा तेज है, जहां लोग इसे “पुलिस रॉट” (पुलिस की सड़ांध) बता रहे हैं।
ऐसी घटना क्यों घटी
आत्महत्या जैसी चरम घटना कभी अचानक नहीं होती; यह लंबे समय से जमा दबाव का विस्फोट है। संदीप कुमार लठर के मामले में कई कारक उभरकर सामने आते हैं। सबसे पहले, विभागीय भ्रष्टाचार का बोलबाला। संदीप के नोट से पता चलता है कि वरिष्ठ अधिकारी जैसे पूरन कुमार जूनियर स्टाफ को भ्रष्टाचार के जाल में फंसा देते थे। रोहतक साइबर सेल में तैनात संदीप शायद ऐसे ही दबाव में थे – जहां सीनियर अधिकारी गैंगस्टर्स से साठगांठ कर पैसे कमाते थे, और जूनियर को चुप रहने या साथ देने का दबाव डाला जाता था। 50 करोड़ का सौदा कोई छोटी रकम नहीं; यह पुलिस-माफिया गठजोड़ का स्पष्ट उदाहरण है, जो जूनियर अधिकारियों के लिए नैतिक दुविधा पैदा करता है।
दूसरा, मानसिक स्वास्थ्य की अनदेखी। भारतीय पुलिस में तनाव का स्तर बेहद ऊंचा है – लंबे ड्यूटी आवर्स, राजनीतिक दबाव और जातिगत पूर्वाग्रह। पूरन कुमार के नोट में जातिवाद का जिक्र था, और संदीप (जो जाट समुदाय से थे) भी इसी दबाव का शिकार हो सकते हैं। हरियाणा जैसे राज्य में जहां जाति राजनीति हावी है, जूनियर अधिकारी अक्सर ऊपरी जातियों के दबदबे से जूझते हैं। X पर एक पोस्ट में कहा गया कि यह “बड़े मछलियों का डरावना खेल” है, जहां जूनियर को चुप रहने के लिए धमकाया जाता है। तीसरा, न्याय व्यवस्था की कमजोरी। संदीप को लगा कि शिकायत करने से कुछ नहीं होगा – ऊपरी अधिकारी संरक्षण में रहते हैं। परिवार का बॉडी रोकना इसी निराशा का प्रतीक है। कुल मिलाकर, यह घटना इसलिए घटी क्योंकि सिस्टम ने संदीप को आवाज देने का मौका नहीं दिया; उल्टा, उसे कुचलने की कोशिश की गई।
यह मामला किस ओर इशारा करता है
यह केस मात्र दो मौतों की कहानी नहीं; यह भारतीय पुलिस सिस्टम की गहरी बीमारी की ओर इशारा करता है। पहला, भ्रष्टाचार का जड़ों में सड़ना। जब एक ADGP और ASI दोनों ही माफिया-साठगांठ के आरोप लगाते हुए मरते हैं, तो सवाल उठता है कि क्या हरियाणा पुलिस में ईमानदार अधिकारी बचे हैं? यह राष्ट्रीय स्तर पर एक संकेत है – जहां पुलिस राजनीति और अपराध के चंगुल में फंसी है। दूसरा, मानसिक स्वास्थ्य संकट। NCRB डेटा बताता है कि पुलिसकर्मियों में सुसाइड रेट सामान्य आबादी से दोगुना है, लेकिन काउंसलिंग या सपोर्ट सिस्टम नाममात्र का है। यह केस हमें मजबूर करता है कि सोचें: क्या हम पुलिस को “सेवक” मानते हैं या “गुलाम”?
तीसरा, जाति और राजनीतिक हस्तक्षेप। हरियाणा में जाट vs गैर-जाट का तनाव पुराना है, और यह केस इसमें ईंधन डालता है। X पर चर्चा से साफ है कि लोग इसे “जातिवादी खेल” बता रहे हैं। चौथा, जांच की विश्वसनीयता। SIT गठन तो ठीक, लेकिन क्या यह निष्पक्ष होगी? परिवार की मांग – हाईकोर्ट जज से जांच – सही है, क्योंकि आंतरिक जांच अक्सर कवर-अप साबित होती है। अंत में, यह मामला समाज को जगाता है: अगर पुलिस खुद असुरक्षित है, तो आम आदमी का क्या होगा? हमें सिस्टम सुधार की जरूरत है – पारदर्शिता, व्हिसलब्लोअर प्रोटेक्शन और मानसिक स्वास्थ्य सपोर्ट। वरना, ऐसी चीखें और तेज होंगी, और शायद अनसुनी रहेंगी।
यह घटना हमें सोचने पर विवश करती है: क्या हम एक ऐसे भारत का सपना देखते हैं जहां न्याय सबके लिए हो, या जहां मौत ही आवाज बन जाए? समय है जागने का।

