छत्तीसगढ़ लोक सेवा आयोग (CGPSC) घोटाला केवल एक परीक्षा की गड़बड़ी नहीं है, बल्कि यह उस तंत्र का आईना है जिसमें योग्यता, परिश्रम और ईमानदारी अक्सर सत्ता, पैसे और प्रभाव के बोझ तले दब जाती है।
रायपुर (छत्तीसगढ़)। छत्तीसगढ़ लोक सेवा आयोग (CGPSC) घोटाला केवल एक परीक्षा की गड़बड़ी नहीं है, बल्कि यह उस तंत्र का आईना है जिसमें योग्यता, परिश्रम और ईमानदारी अक्सर सत्ता, पैसे और प्रभाव के बोझ तले दब जाती है। जिस परीक्षा से राज्य के प्रशासनिक भविष्य का निर्माण होना था, वही अब सवालों के घेरे में है। युवाओं की मेहनत पर जब सत्ता की साजिशें हावी हो जाएं, तो विश्वास टूटता है – न सिर्फ व्यवस्था से, बल्कि अपने ही देश से। हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणियां इसी टूटी हुई आशा को फिर से जोड़ने का प्रयास हैं। यह मामला केवल भर्ती प्रक्रिया का नहीं, बल्कि न्याय, पारदर्शिता और जनविश्वास की पुनर्स्थापना की लड़ाई बन चुका है।
न्यायालय की सख्त टिप्पणी से हड़कंप
छत्तीसगढ़ लोक सेवा आयोग (CGPSC) भर्ती घोटाले ने एक बार फिर राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। हाईकोर्ट ने राज्य सरकार से तीखे सवाल करते हुए पूछा कि जब इस मामले में कई गिरफ्तारियां हो चुकी हैं, तो जांच अधूरी क्यों है? अदालत ने यह भी जानना चाहा कि 37 चयनित उम्मीदवारों को अब तक नियुक्ति पत्र क्यों नहीं जारी किए गए, जबकि उनका चयन विधिवत प्रक्रिया के तहत हुआ था। मंगलवार को हुई सुनवाई में डिवीजन बेंच ने सरकार से विस्तृत स्टेटस रिपोर्ट प्रस्तुत करने का निर्देश देते हुए कहा कि “सरकार यह स्पष्ट करे कि आखिर न्याय में देरी क्यों की जा रही है।” अदालत की सख्त टिप्पणियों के बाद प्रशासनिक हलकों में हलचल मच गई है।
CGPSC से जुड़े बड़े विवादित मामले
- साल 2003 सवालों से लेकर भर्ती में गड़बड़ी
- साल 2005 में भी सवालों से लेकर भर्ती गड़बड़ी दोहराई गई
- साल 2008 मॉडल आंसर और चयन में गड़बड़ी का मामला
- 2017 में प्री की परीक्षा में 50 से ज्यादा सवाल गलत निकले
- साल 2005 और 2008 में सिविल जज, 2016 में असिस्टेंट प्रोफेसर भर्ती, 2018 में इंजीनियरिंग सेवा परीक्षा, 2019 में सिविल जज की परीक्षा भी विवादों में रही

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हाईकोर्ट ने पूछा – “जांच अधूरी क्यों?”
राज्य सरकार की ओर से दायर अपील पर सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति रमेश कुमार सिन्हा और न्यायमूर्ति बी.डी. गुरु की डिवीजन बेंच ने जांच की धीमी रफ्तार पर असंतोष व्यक्त किया। कोर्ट ने कहा कि जब प्रमुख आरोपी जैसे तत्कालीन परीक्षा नियंत्रक और आयोग के वरिष्ठ अधिकारी पहले ही गिरफ्तार किए जा चुके हैं, तो बाकी लोगों की जांच लंबित रखना प्रशासन की उदासीनता दर्शाता है। अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि “एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में पारदर्शिता सबसे बड़ा सिद्धांत है। यदि चयन प्रक्रिया पर संदेह है, तो उसे समयबद्ध तरीके से सुलझाना सरकार का दायित्व है।” कोर्ट ने सीबीआई और राज्य सरकार दोनों को आदेश दिया कि वे अगले हफ्ते तक पूरी स्टेटस रिपोर्ट प्रस्तुत करें, जिसमें प्रत्येक आरोपी की भूमिका का उल्लेख हो।
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नियुक्ति रोकने पर उठाए सवाल
हाईकोर्ट ने इस सुनवाई में विशेष रूप से उन 37 उम्मीदवारों की नियुक्तियों पर चिंता जताई, जो चयन सूची में शामिल हैं, परंतु उन्हें अब तक पदभार नहीं मिला। अदालत ने कहा कि इन अभ्यर्थियों को बिना किसी ठोस कारण के “अनिश्चितता और अविश्वास की स्थिति” में रखना न केवल उनके अधिकारों का उल्लंघन है, बल्कि प्रशासनिक निष्पक्षता पर भी प्रश्नचिह्न लगाता है। अदालत ने यह भी कहा कि यदि पेपर लीक या परीक्षा में धांधली की बात सही है, तो पूरी परीक्षा पर पुनर्विचार किया जाना चाहिए। लेकिन जांच पूरी होने से पहले उम्मीदवारों को रोके रखना न्यायसंगत नहीं है। इस दौरान कोर्ट ने सरकार से पूछा, “क्या यह उचित है कि योग्य उम्मीदवार अपनी मेहनत और सफलता के बावजूद वर्षों तक प्रतीक्षा करें?”
विधायक ननकी राम कंवर की याचिका में इनके विरुद्ध शिकायत है
| अभ्यर्थी | पद | रिश्तेदारी | |
|---|---|---|---|
| 1 | नितेश | डिप्टी कलेक्टर | PSC अध्यक्ष टामन सिंह के बेटे |
| 2 | साहिल | डीएसपी | टामन सिंह के बड़े भाई के बेटे |
| 3 | निशा कोसले | डिप्टी कलेक्टर | टामन सिंह की बहू |
| 4 | दीपा अजगले आडिल | जिला आबकारी अधिकारी | अधिकारी टामन सिंह सोनवानी की भाई बहू |
| 5 | सुनिता जोशी | लेबर ऑफिसर | टामन सिंह सोनवानी की बहन की बेटी |
| 6 | सुमित ध्रुव | डिप्टी कलेक्टर | पीएससी सचिव के बेटे |
| 7 | नेहा खलखो | डिप्टी कलेक्टर | राज्यपाल के सचिव अमृत खलखो की बेटी |
| 8 | निखिल खलखो | डिप्टी कलेक्टर | राज्यपाल के सचिव अमृत खलखो के बेटे |
| 9 | साक्षी ध्रुव | डिप्टी कलेक्टर | डीआईजी ध्रुव की बेटी |
| 10 | प्रज्ञा नायक | डिप्टी कलेक्टर | कांग्रेस नेता के ओएसडी के रिश्तेदार की बेटी |
| 11 | प्रखर नायक | डिप्टी कलेक्टर | कांग्रेस नेता के ओएसडी के रिश्तेदार का बेटा |
| 12 | अनन्या अग्रवाल | डिप्टी कलेक्टर | कांग्रेस नेता की बेटी |
| 13 | शशांक गोयल | डिप्टी कलेक्टर | कांग्रेस नेता सुधीर कटियार का दामाद |
| 14 | भूमिका कटियार | डिप्टी कलेक्टर | कांग्रेस नेता सुधीर कटियार की बेटी |
| 15 | खुशबू बिजौरा | डिप्टी कलेक्टर | मंत्री के ओएसडी के साढ़ू की बेटी |
| 16 | स्वर्णिम शुक्ला | डिप्टी कलेक्टर | कांग्रेस नेता राजेंद्र शुक्ला की बेटी |
| 17 | राजेंद्र कुमार कौशिक | डिप्टी कलेक्टर | कांग्रेस नेता का बेटा |
| 18 | मीनाक्षी गन्विर | डिप्टी कलेक्टर | टामन सिंह सोनवानी के करीबी की बेटी |

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जांच की वर्तमान स्थिति पर सवाल
सीबीआई की ओर से अदालत को बताया गया कि फिलहाल 17 उम्मीदवारों की भूमिका की जांच चल रही है, जबकि शेष अभ्यर्थियों पर चार्जशीट दाखिल नहीं हुई है। इस पर कोर्ट ने नाराजगी जाहिर करते हुए कहा कि प्रारंभिक रिपोर्ट में 41 लोगों के नाम थे, लेकिन अब जांच केवल 17 तक सीमित क्यों रह गई है? अदालत ने स्पष्ट किया कि जांच अधूरी छोड़ना या टालना “जनविश्वास के साथ धोखा” है। न्यायमूर्ति सिन्हा ने कहा, “जब तक प्रशासन अपने ही तंत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्त नहीं होगा, तब तक योग्य युवाओं में निराशा बढ़ेगी।” कोर्ट ने सरकार से यह भी पूछा कि आयोग के किन-किन अधिकारियों को जांच के दायरे में लिया गया है, और क्या किसी के खिलाफ विभागीय कार्रवाई हुई है?
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12 गिरफ्तारियां और भारी खुलासे
इस घोटाले में अब तक कुल 12 लोगों की गिरफ्तारी हो चुकी है, जिनमें तत्कालीन अध्यक्ष टामन सिंह सोनवानी और उद्योगपति श्रवण कुमार गोयल जैसे प्रभावशाली नाम शामिल हैं। नवंबर 2024 में दोनों को सीबीआई ने हिरासत में लिया था, जिसके बाद जनवरी 2025 में आयोग के उप परीक्षा नियंत्रक ललित गणवीर, नितेश सोनवानी, भूमिका कटियार, शशांक गोयल और डीएसपी चयनित साहिल सोनवानी को गिरफ्तार किया गया। इनमें से कुछ आरोपी चयन सूची में भी शामिल थे। जांच में खुलासा हुआ कि चयन प्रक्रिया में अभ्यर्थियों को पहले से प्रश्नपत्र उपलब्ध कराए गए थे और इंटरव्यू अंकों में भी हेराफेरी की गई। कई अभ्यर्थियों के उत्तरपत्रों में समान शब्दशः उत्तर पाए गए, जो घोटाले की गहराई को दर्शाते हैं।
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भ्रष्टाचार का खेल – योग्य बाहर, रसूखदार अंदर
CGPSC भर्ती घोटाला केवल एक परीक्षा की त्रुटि नहीं, बल्कि उस तंत्र का उदाहरण है जहां योग्यता से अधिक रसूख काम करता है। 2020 से 2022 के बीच आयोग की विभिन्न परीक्षाओं में कथित रूप से प्रशासनिक और राजनीतिक प्रभावशाली परिवारों के अभ्यर्थियों को उच्च पदों पर चयनित किया गया। डिप्टी कलेक्टर, डीएसपी और अन्य राजपत्रित पदों पर ऐसे लोगों को मौका मिला, जिनके खिलाफ स्पष्ट साक्ष्य हैं कि उन्होंने अनुचित साधनों का प्रयोग किया। इस दौरान कई योग्य अभ्यर्थियों के सपने चकनाचूर हो गए। आयोग के अंदरूनी सूत्रों ने भी माना कि चयन प्रक्रिया पर बाहरी दबाव था। यही कारण है कि जनता और अभ्यर्थियों के बीच PSC की साख बुरी तरह से गिर चुकी है।
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न्याय की उम्मीद और जनविश्वास की परीक्षा
2021 की इस परीक्षा में 171 पदों के लिए करीब दो लाख उम्मीदवारों ने आवेदन किया था। यह सिर्फ रोजगार का अवसर नहीं, बल्कि युवाओं के भविष्य का सवाल था। आज जब हाईकोर्ट ने सरकार से जवाब-तलब किया है, तो हजारों अभ्यर्थियों की उम्मीदें एक बार फिर जागी हैं। अदालत की सख्ती ने यह संदेश दिया है कि चाहे घोटाला कितना भी बड़ा क्यों न हो, न्यायिक व्यवस्था अब खामोश नहीं रहेगी। इस प्रकरण ने यह भी साबित कर दिया कि यदि भर्ती प्रक्रिया पर सवाल उठते हैं, तो यह केवल प्रशासनिक समस्या नहीं, बल्कि पूरे लोकतंत्र के नैतिक ताने-बाने पर चोट है। अब सबकी नजरें सरकार और जांच एजेंसियों पर हैं – क्या वे सच्चाई सामने लाएंगी या फिर यह घोटाला भी फाइलों में दफन रह जाएगा?
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छत्तीसगढ़ सरकार ने हाई कोर्ट का फैसला नहीं माना
छत्तीसगढ़ लोक सेवा आयोग (CGPSC) की 2021 भर्ती परीक्षा लंबे समय से विवादों में रही। घोटालों, रिश्तेदारीवाद और सत्ता के साए में दबी इस परीक्षा ने कई योग्य युवाओं के भविष्य पर प्रश्नचिह्न लगा दिया था। 29 जुलाई 2025 को बिलासपुर हाईकोर्ट ने न्याय की नई रोशनी दिखाई थी। कोर्ट ने कहा था — “जिन अभ्यर्थियों के खिलाफ कोई आरोप या चार्जशीट नहीं है, उन्हें 60 दिनों में नियुक्त किया जाए।”
आज अक्टूबर 2025 की स्थिति में छत्तीसगढ़ सरकार ने कोर्ट का फैसला नहीं माना।
जब परीक्षा घोटाले का प्रतीक बन गई
26 नवंबर 2021 को CGPSC ने 171 पदों के लिए विज्ञापन जारी किया था — डिप्टी कलेक्टर, डीएसपी, जेल अधीक्षक, नायब तहसीलदार समेत 20 सेवाओं के लिए। परिणाम 11 मई 2023 को आए, पर खुशियों की जगह आरोपों का सैलाब उमड़ पड़ा। कहा गया कि चयन सूची में कई नेताओं और अधिकारियों के रिश्तेदार शामिल हैं। परीक्षा का अर्थ बदल गया — “योग्यता” पीछे छूट गई और “संबंध” आगे बढ़ गए। इसी घोटाले को लेकर पूर्व मंत्री ननकीराम कंवर ने हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर की और घोटाले की जड़ें उजागर कीं।
जांच, रोक और बेरोजगार उम्मीदें
हाईकोर्ट ने भर्ती प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सवाल उठाए, राज्य सरकार ने जांच के आदेश दिए, और अंततः मामला CBI को सौंपा गया। जांच शुरू हुई, लेकिन इसके साथ ही योग्य और बेदाग अभ्यर्थियों की नियुक्ति रोक दी गई। वे युवा, जिन्होंने अपने जीवन के कई वर्ष तैयारी में लगाए, मेरिट सूची में जगह पाई, अचानक “संदेह” के घेरे में आ गए — बिना किसी दोष के।
जब अदालत ने कहा – “भविष्य से मत खेलो”
इन वंचित अभ्यर्थियों ने अदालत की शरण ली। हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति अमितेंद्र किशोर प्रसाद ने सुनवाई में स्पष्ट कहा — “कुछ लोगों के दोष का भार सब पर नहीं डाला जा सकता। बेदाग अभ्यर्थियों के भविष्य के साथ खिलवाड़ संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 का उल्लंघन है।” यह टिप्पणी सिर्फ एक कानूनी अवलोकन नहीं, बल्कि उस युवा पीढ़ी के लिए संदेश थी — कि न्याय देर से सही, पर आता जरूर है।
सरकार का तर्क और न्याय की कसौटी
राज्य सरकार ने अदालत में कहा कि भर्ती प्रक्रिया में अनियमितताएं हैं, और जांच अभी जारी है। पर कोर्ट ने दृढ़ता से कहा — “जिनके खिलाफ कोई आरोप नहीं, उन्हें रोका नहीं जा सकता।” PSC ने सफाई दी कि आयोग की भूमिका चयन सूची तक सीमित है, जबकि नियुक्ति आदेश राज्य सरकार जारी करती है। हाईकोर्ट ने 2 मई को सुनवाई पूरी की थी और 29 जुलाई को निर्णय सुनाया — “बेदाग उम्मीदवारों को 60 दिनों में नियुक्त करें, नियुक्तियां CBI जांच और कोर्ट के फैसले के अधीन रहेंगी।”
यह फैसला केवल अभ्यर्थियों के लिए नहीं, व्यवस्था के लिए भी है
यह आदेश केवल 60 युवाओं की उम्मीदों का नहीं, बल्कि उस सिस्टम की आत्मा का सवाल है, जो लंबे समय से “भर्ती” को “भ्रष्टाचार” से जोड़ देता है। यह याद दिलाता है कि जब संस्थाएं डगमगाती हैं, तब न्यायालय व्यवस्था को संतुलित करता है। यह निर्णय एक चेतावनी भी है — कि योग्यता को निलंबित नहीं किया जा सकता, और ईमानदारी को हमेशा एक रास्ता मिलता है, भले देर से सही।
(bhadas.org)





