क्या अभिषेक सिंह फिर से छत्तीसगढ़ के राजनीतिक मैदान में उतरेंगे, या राजनीति को अलविदा कह देंगे? समय ही बताएगा।
छत्तीसगढ़ की राजनीति में कभी चमकते सितारे की तरह उभरे अभिषेक सिंह आजकल सुर्खियों से कोसों दूर हैं। पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के सुपुत्र और राजनांदगांव लोकसभा सीट से पूर्व सांसद अभिषेक सिंह का नाम भले ही भाजपा की पुरानी लिस्ट में दर्ज हो, लेकिन राज्य की राजधानी रायपुर की गलियों या विधानसभा की बहसों में उनकी मौजूदगी न के बराबर है। 2014 में पिता के सत्ता-काल में लोकसभा पहुंचने वाले इस युवा नेता का राजनीतिक सफर अब ठहरा-सा लगता है। क्या है इसके पीछे का राज? क्यों रखे हुए हैं वे खुद को राजनीति की चकाचौंध से दूर? आइए, इसकी परतें खोलते हैं।
अभिषेक सिंह का राजनीतिक सफर शुरू तो धमाकेदार था। 1981 में जन्मे अभिषेक इंजीनियरिंग और एमबीए (XLRI से) की डिग्री हासिल करने के बाद 2014 के लोकसभा चुनाव में राजनांदगांव से भाजपा के टिकट पर उतरे। पिता रमन सिंह के प्रभाव और अपनी मेहनत से उन्होंने कांग्रेस के कमलेश्वर वर्मा को 52,000 से अधिक वोटों से हराया। यह जीत छत्तीसगढ़ भाजपा के लिए एक बड़ा संदेश थी—रमन सिंह का परिवार राजनीति में मजबूत जड़ें जमा रहा है। लेकिन इसके बाद की कहानी उतनी चमकदार नहीं रही। 2019 और 2024 के लोकसभा चुनावों में उन्हें टिकट ही नहीं मिला। 2019 में भाजपा ने वरिष्ठ नेता संतोष पांडे को चुना, जबकि 2024 में पुनः संतोष पांडेय को मौका दिया गया, जो विजेता रहे। इन घटनाक्रमों ने अभिषेक सिंह को राजनीतिक पटल से धीरे-धीरे गायब कर दिया।
हाल ही में, अगस्त 2025 में, छत्तीसगढ़ भाजपा की कार्यकारिणी के पुनर्गठन ने अभिषेक सिंह के राजनीतिक पुनरागमन की आखिरी उम्मीदों पर पानी फेर दिया। पूर्व मुख्यमंत्री रमन सिंह ने अपने बेटे को राज्य महासचिव का पद दिलाने के लिए जोरदार लॉबिंग की। पार्टी सूत्रों के मुताबिक, रमन सिंह ने “सभी संभव तार खींचे“, लेकिन केंद्रीय नेतृत्व ने नया चेहरा लाने का फैसला किया। नई कार्यकारिणी में आठ उपाध्यक्ष, तीन महासचिव, आठ सचिव और एक कोषाध्यक्ष शामिल हैं, लेकिन अभिषेक का नाम कहीं नहीं। न केवल अभिषेक सिंह, बल्कि रमन सिंह खुद भी इस पुनर्गठन से बाहर रह गए। पूर्व मंत्री बृजमोहन अग्रवाल, केदार कश्यप, प्रेम प्रकाश पांडे जैसे कई दिग्गजों को भी दरकिनार कर दिया गया। यह फैसला भाजपा की रणनीति को दर्शाता है—पुराने चेहरों को हाशिए पर धकेलकर युवा और नए नेताओं को बढ़ावा देना।

तो, अभिषेक सिंह छत्तीसगढ़ की राजनीति से दूर क्यों हैं जबकि यहाँ तथाकथित ट्रिपल इंजन की सरकार है ? राज्य में सब कुछ अच्छा है फिर भी उन्हें राजनीति के दूर क्यों रखा जा रहा है । राजनीतिक जानकारों और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के अंदरूनी हलकों के अनुसार, कई कारण हो सकते हैं। पहला, लगातार चुनावी हार एवं लोकप्रियता में कमी। 2014 के बाद टिकट न मिलना उनके आत्मविश्वास को तोड़ सकता है। दूसरा, विवादों का साया। 2018 में पनामा पेपर्स में उनका नाम आया, जहां ‘अभिषक सिंह’ के नाम से चेलेट एस्टेट्स प्राइवेट लिमिटेड का डायरेक्टर बताया गया। कांग्रेस ने इसे भ्रष्टाचार का सबूत ठहराया, हालांकि अभिषेक ने स्पेलिंग गलती का हवाला देकर इनकार किया। यह विवाद उनके राजनीतिक करियर पर काला धब्बा बन गया। तीसरा, भाजपा की आंतरिक राजनीति। रमन सिंह का केंद्रीय नेतृत्व के साथ प्रभाव कम हुआ है। 2018 में कांग्रेस की जीत के बाद रमन सिंह खुद विपक्ष में चले गए, और अब विधानसभा अध्यक्ष के रूप में भी वे ‘सोफा’ पर सिमटे नजर आते हैं। अभिषेक को ‘पारिवारिक नेपोटिज्म’ का टैग भी चिपक गया है, जो भाजपा के ‘परिवारवाद विरोधी’ नैरेटिव से टकराता है।
राजधानी रायपुर में अभिषेक सिंह की अनुपस्थिति और भी साफ दिखती है। वे ज्यादातर राजनांदगांव या दिल्ली में रहते हैं, जहां पूर्व मुख्यमंत्री पिता का प्रभाव अभी भी मजबूत है। रायपुर की राजनीतिक सभाओं, प्रेस कॉन्फ्रेंस या विधानसभा सत्रों में उनका चेहरा नजर नहीं आता। सोशल मीडिया पर भी उनकी सक्रियता कम है—ट्विटर हैंडल (@CGAbhishekSingh) पर आखिरी पोस्ट महीनों पुरानी है। फेसबुक पर थोड़ा सक्रिय दिखते हैं लेकिन राजनांदगांव तक ही सीमित हैं । कुछ स्थानीय नेता मानते हैं कि अभिषेक सिंह ने राजनीति से दूरी बनाई है और अब बिजनेस या सामाजिक कार्यों पर फोकस कर रहे हैं। एक पूर्व भाजपा नेता ने नाम न छापने की शर्त पर कहा, “अभिषेक पढ़े-लिखे हैं, लेकिन राजनीति की कड़वाहट ने उन्हें पीछे हटा लिया। रमन जी की कोशिशें जारी हैं, लेकिन पार्टी अब विष्णु देव साय और अरुण साव जैसे नए चेहरों पर दांव लगा रही है।”

छत्तीसगढ़ की राजनीति में कभी सियासी तूफान उठाने वाला पनामा पेपर्स विवाद आज भी पूर्व सांसद अभिषेक सिंह के नाम को परेशान करता होगा। 2016 से 2018 तक चले इस विवाद ने न केवल रमन सिंह परिवार की छवि को खराब किया , बल्कि भाजपा-कांग्रेस के बीच तीखी जंग को हवा भी दी। अंतरराष्ट्रीय जांच एजेंसी आईसीआईजे (ICIJ) के खुलासों ने अभिषेक सिंह को ‘अभिषक सिंह’ के नाम से जोड़ा, जो कथित रूप से ऑफशोर कंपनियों से जुड़े थे। लेकिन अभिषेक ने इसे साजिश करार देते हुए खारिज किया।
क्या अभिषेक सिंह का राजनीतिक पुनरागमन संभव है? आने वाले विधानसभा चुनावों (2028) में राजनांदगांव या आसपास की सीट पर दावा मजबूत हो सकता है, अगर डा. रमन सिंह का प्रभाव लौटे। लेकिन फिलहाल, वे छत्तीसगढ़ की राजनीति के उस कोने में हैं, जहां चमक कम और साये ज्यादा हैं। यह कहानी न केवल एक परिवार की है, बल्कि भाजपा की आंतरिक जद्दोजहद की भी। क्या अभिषेक सिंह फिर से छत्तीसगढ़ के राजनीतिक मैदान में उतरेंगे, या राजनीति को अलविदा कह देंगे? समय ही बताएगा।
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